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जहां प्रकाश के स्रोत की अनुस्यूति नहीं है, वहां प्रकाश कैसे होगा?-सुभाष बुड़ावन वाला

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सम्प्रदाय धर्म का शरीर है तो अध्यात्म उसकी आत्मा

एक तोता पिंजरे में बैठा है। वह कुछ बोल रहा है। उसे जो रटाया गया, उसी की पुनरावृत्ति कर रहा है। तोते में स्मृति है पर चिंतन नहीं है। मनुष्य में स्मृति और चिंतन दोनों हैं। मनुष्य कोरी रटी-रटाई बात नहीं दुहराता, वह नयी बात सोचता है, नया पथ चुनता है और उस पर चलता है।
एक भैंसा हजार वर्ष पहले भी भार ढोता था और आज भी ढो रहा है। उसने कोई प्रगति नहीं की है। क्योंकि उसमें स्वतंत्र चिंतन नहीं है।
मनुष्य ने बहुत प्रगति की है। वह प्रस्तर युग से अणुयुग तक पहुंच गया है। वह झोंपड़ी से सौ मंजिलें-प्रासाद तक पहुंच गया है। उसने जीवन के हर क्षेत्र में विकास और गति की है। स्मृति और स्वतंत्र-चिंतन की संबंध-श्रृंखला, परम्परा है। यदि मनुष्य परम्पराविहीन होता तो भैंसे से बहुत अतिरिक्त नहीं होता। मानवीय विकास का इतिहास परम्परा का इतिहास है। अतीत की अनुभूतियों के तेल से मनुष्य का चिंतन-दीप जला है और उसके आलोक में उसे वर्तमान की अनेक पगडंडियां उपलब्ध हुई हैं।
मनन व दर्शन
कुछ लोग परम्परा का विच्छेद करना चाहते हैं पर ऐसा हो नहीं सकता। जिसमें स्मृति है वह कोई भी व्यक्ति परम्परा मुक्त नहीं हो सकता। स्मृति और परम्परा में गहरा सम्बन्ध है। मैं निश्चय की भाषा में कहूं तो मुझे कहना चाहिए कि स्मृति ही परम्परा है।
हम मनुष्य हैं। स्मृति हमारी विशेषता है। हम अतीत से लाभान्वित होना चाहते हैं। इसलिए परम्परा से मुक्त नहीं हो सकते, उसका परिष्कार कर सकते हैं। प्रशिक्षण की यही उपयोगिता है। प्रशिक्षण पशु-पक्षियों को भी दिया जाता है, उनमें पटुता भी आती है। पर वे स्वतंत्र चिंतन के अभाव में मनुष्य की भांति पटु नहीं बन सकते।
एक बंदर को प्रशिक्षित किया गया। वह राजा की परिचर्या में रहता था। एक दिन राजा सो रहा था। बंदर नंगी तलवार हाथ में लिए पहरा दे रहा था। राजा के गले पर मक्खी बैठ गई। बन्दर ने उसे उड़ाने की चेष्टा की। वह उड़ी नहीं तो वह क्रोध में आकर उस पर तलवार चला दी। राजा का गला लहूलुहान हो गया।
प्रशिक्षण के साथ अपने मनन व दर्शन का योग न हो तो वह विकासशील नहीं बनता। आज तक विकास की जितनी रश्मियां इस भूमि पर आई हैं, वे सब स्मृति, परम्परा, प्रशिक्षण, मनन और दर्शन के वायुमण्डल से छानकर आई हैं। हम धर्म की चर्चा इसीलिए करना चाहते हैं कि न रश्मियों के केन्द्र में धर्म प्रतिष्ठित है। धर्म की उपेक्षा कर मनुष्य विकास से ही विमुख नहीं होता, किन्तु सामुदायिक जीवन की आधार-भित्ति से भी विमुख हो जाता है। सत्य और विश्वसनीय व्यवहार के बिना क्या सामाजिक जीवन का कोई अस्तित्व है? मनुष्य एक-दूसरे के विश्वास पर समुदित हुआ है इसी विश्वास के आधार पर जीवन का व्यवहार चल रहा है। गोद में सोए हुए का सिर काटने की मनोवृत्ति यदि व्यापक होती तो मनुष्य अकेला होता, जंगली होता, सामाजिक जीवन जीने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं होता। पर ऐसा नहीं होता है। मनुष्य में सत्य की आस्था है। सत्य के पौधे पर विश्वास के फूल खिले हुए हैं। उन्हीं की सुगन्धि से समुदित मनुष्य सामुदायिकता के मंच पर अनेक प्रकार के अभिनय कर रहा है। सत्य को केन्द्र में रखे बिना सामाजिक विकास नहीं हो सकता तो क्या धर्म की उपेक्षा कर वह किया जा सकता है? मैं पूरी निष्ठा के साथ कहूंगा कि नहीं किया जा सकता। धर्म और क्या है? वह सत्य ही तो धर्म है।
एक संस्कृति कवि ने कहा- ‘जिस व्यक्ति का दिल धर्म से शून्य होता है, वह लोहार की धौंकनी की भांति श्वांस लेता है पर जीता नहीं है।’ यदि बात मैं कहता तो मेरी भाषा यह होती कि वह श्वास नहीं ले सकता। क्या भूखे भेड़िये की शरण में जाकर कोई श्वास ले सकता है? क्या हिंसा, क्रूरता, असत्य और चौर्य के साम्राज्य की सृष्टि कर मनुष्य सामाजिक जीवन जी सकता है? यह संभव नहीं तो मैं कहूंगा कि धर्म के बिना जीना असंभव है। पतझड़ आता है, पेड़ के पत्र, पुष्प और फल सभी झड़ जाते हैं। वसंत आता है पेड़ फिर से पत्र, पुष्प और फल से भर जाता है। यह क्रम चलता ही रहता है। धर्म की परिधि में सत्ता और अर्थ आ जाते हैं, तब एक विचार क्रांति होती है और धर्म की परिधि सिमट जाती है। फिर उसके अनुशासन की अपेक्षा प्रतीत होती है और उसकी परिधि व्यापक हो जाती है। पतझड़ में भी पेड़ का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। धर्म के परिवार का लोप हो जाने पर भी उसका अस्तित्व कभी विलुप्त नहीं होता। एक प्रासाद बनता है और पुराना होने पर ढह जाता है। प्रासाद बनने पर आकाश व्यक्त होता है और उसके ढह जाने पर वह अव्यक्त हो जाता है पर आकाश का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता। धार्मिक लोग अच्छे होते हैं, धर्म व्यक्त हो जाता है। धार्मिक लोग बाहरी क्रियाकाण्डों में उलझ जाते हैं, धर्म अव्यक्त हो जाता है। किन्तु अव्यक्त और अनस्तित्व एक नहीं है।
भौतिकवाद का विकास हो रहा है। लोग धर्म को भुलाते जा रहे हैं। मार्क्स ने कहा, ‘धर्म अफीम है, एक मादक द्रव्य है। वह व्यक्ति में उन्माद पैदा करता है।’ इस दर्शन के आधार पर चलने वाले धर्म को विकास में सर्वोपरि बाधा मानते हैं। साम्यवादी देशों ने धर्म के उन्मूलन का प्रयत्न भी किया है। किन्तु
यह सब धर्म के शरीर पर घटित हो रहा है। धर्म के शरीर को भुलाया जा सकता है, धर्म को नहीं भुलाया जा सकता। जिसके प्रति श्रध्दा होती है, वह मनुष्य के लिये मादक बन जाता है। राष्ट्रनिष्ठ लोगों के लिये मादक बन जाता है। राष्ट्रनिष्ठ लोगों के लिये क्या राष्ट्र मादक नहीं बनता? भाषानिष्ठ लोगों के लिये क्या भाषा मादक नहीं बनती? जाति, वर्ण आदि जो भी मानवीय उपकरण हैं, वे मनुष्य की श्रध्दा प्राप्त कर मादक बन जाते हैं। हम इस सच्चाई को क्यों अस्वीकार करें कि धर्म में मादकता है। प्रस्तुत प्रसंग में एक सत्य को अनावृत करना भी आवश्यक है। यह मादकता धर्म के शरीर में है, उसकी आत्मा में नहीं है। धर्म का शरीर है सम्प्रदाय और उसकी आत्मा है अध्यात्म। शरीर सहज ही प्राप्त हो जाता है। आत्मा की प्राप्ति साधना द्वारा होती है। आत्मा तक पहुंचने वाले धार्मिक बहुत कम होते हैं। वे साम्प्रदायिक मादकता से बच ही कैसे सकते हैं? जब अध्यात्म को विच्छित्र कर मनुष्य धर्म-शरीर से चिपकते हैं, तब धर्म निष्प्राण हो जाता है। फिर आत्मानुशासन और व्यापक दृष्टिकोण समाप्त हो जाता है। धर्म कृत्रिम नियमों और संकीर्ण दृष्टिकोण का पुंज बन जाता है। वैसा धर्म सामाजिक परिवर्तन में बाधा डालता है। तब सामाजिक क्रांति करने वाले उसे सब रूढ़ियों को शरण देने वाला संस्थान मानकर उसके उन्मूलन का प्रयत्न करते हैं। ऐसे रूढ़ और अध्यात्म से विच्छिन्न धर्म-शरीर के प्रति हमारी कोई निष्ठा नहीं है। धर्म के क्षेत्र में बहुत बड़ी क्रांति अपेक्षित है।
जन्म से पर्यांत धर्म करने वालों में व्यक्ति दृष्टि और मैत्री विकसित नहीं होती, इसका फलित है कि अध्यात्म की प्रतिष्ठा प्राप्त किये बिना धर्म हमारे जीवन में अलौकिक परिवर्तन नहीं ला सकता। लौकिक परिवर्तन के लिये हमारा लौकिक विज्ञान पर्याप्त है। उसके लिये हमें धर्म की शरण में जाने की कोई अपेक्षा नहीं है। प्रभु के नाम की माला जपने वाला किसी दिन माला नहीं जपता है तो उसे ऐसा प्रतीत होता है कि आज का दिन व्यर्थ चला गया। वह अनैतिक और अप्रमाणिक व्यवहार करता है, उसे ऐसी अनुभूति नहीं होती कि आज का दिन व्यर्थ चला गया। धर्म की समझ जीवन में परिवर्तन लाने के लिये नहीं है, किन्तु जीवनगत अशुध्दियों को यथावत बनाए रखने के लिये है। धर्म का आचरण इसलिए नहीं हो रहा है कि जीवन व्यवहार की बुराइयां मिट जाएं, किन्तु वह इसलिए हो रहा है कि बुराइयों से प्राप्त होने वाला दोष घुल जाए। एक आदमी आयुर्वेद -विशारद से कह रहा है कि मैं स्वाद-लोलुपता को छोड़ने में असमर्थ हूं। मुझे ऐसी औषधि दो, जिससे खूब खाऊं और बीमार न बनूं। क्या धार्मिक भी इसी भाषा में नहीं सोच रहा है? दो व्यक्तियों के बीच न्यायालय में मामला चल रहा है। दोनों उसे जीतने के लिए धर्म की आराधना करते हैं। जो झूठा है, वह क्या धर्म से अधर्म की, सत्य से असत्य की विजय नहीं चाहता? यदि चाहता है तो धर्म या सत्य में उसकी आस्था कहां है? उसने धर्म को अपनी स्वार्थसिध्दि का साधन मात्र मान रखा है।
धर्म जब-जब कामना की पूर्ति का साधन बनता है, तब-तब उसके आसपास विकार घिर जाते हैं। विकारों से घिरा हुआ धर्म भूत से भी अधिक भयंकर हो जाता है। महावीर ने ऐसे धर्म के खतरे की स्पष्ट चेतावनी दी थी। उनकी वाणी है- कालकूट विष का पान, अविधि से पकड़ा हुआ शस्त्र और सुरक्षा की विधि जाने बिना साधा हुआ बेताल जैसे खतरनाक होते हैं, वैसे ही विकारों से सम्पन्न धर्म खतरनाक होता है। इस प्रकार के खतरनाक धर्मों को ही मार्क्स ने अफीम कहा था। अध्यात्म से अनुप्राणित धर्म अफीम या मादक नहीं होता।
अध्यात्म क्या है?
स्वतंत्रता की अनुभूति : इससे आकांक्षा के उत्ताप और बंधन टूट जाते हैं।
पूर्णता की अनुभूति : इससे रिक्तताएं भर जाती हैं, शून्य ठोस में बदल जाता है।
आनंद की अनुभूति : इससे दु:ख की परम्परा विच्छिन्न हो जाती है। इंद्रियां, मन और बुध्दि हमारे सामने हैं। ये अपने आलोक से आलोकित नहीं है। जो इन्हें आलोकित करता हुआ भी पर्दे के पीछे है, वह अध्यात्म है। स्वतंत्रता की मांग वहीं से आ रही है। पूर्णता का स्वर वहीं से उठ रहा है। आनंद की उर्मि वहीं से उच्छलित हो रही है। बटन दबाते ही बल्ब प्रकाशित हो उठता है किन्तु उस प्रकाश का स्रोत बल्ब नहीं है। प्रकाश का स्रोत बिजलीघर (पावर-हाउस) है। चैतन्य का स्रोत इंद्रिय, मन और बुध्दि नहीं है, किन्तु अध्यात्म है, जो हर व्यक्ति में अनन्त सागर की तरह लहरा रहा है।
जिस क्षण स्वतंत्रता की अनुभूति नहीं है, वह क्षण धर्म के स्रोत से अनुस्यूत नहीं है। जिस क्षण आनंद की अनुभूति नहीं है, वह क्षण धर्म के स्रोत से अनुस्यूत नहीं है। जहां प्रकाश के स्रोत की अनुस्यूति नहीं है, वहां प्रकाश कैसे होगा?-सुभाष बुड़ावन वाला

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