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हास्य! दे...थप्पड़ पे थप्पड़। .सभाष बुड़ावन वाला

Posted On: 26 Jan, 2016 Others,social issues,हास्य व्यंग में

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एक बार एक भिखारी की लॉटरी खुल जाती है। वह उन लॉटरी के पैसों से एक मंदिर बनवाता है। दूसरा गरीब उससे पूछता है कि तुमने यह मंदिर क्यों बनवाया है। वह जवाब देता है कि “मैंने यह मंदिर इसलिए बनवाया है कि अब मैं इस मंदिर में अकेला भीख मांगूंगा”। अपनी ही कमाई होगी। दर्द और बेबसी क्या होती है,  ये उस बच्चे से पूछो … . . जिसकी छुट्टी हुए 15 मिनट हो चुके हों, लेकिन मैडम अभी भी पढ़ा रही हो ??? !! ——— प्राचीन काल में जो लोग अपनी नींद, भोजन, हंसी, परिवार, अन्य संसारिक सुखों को त्याग देते थे, उन्हें ऋषि-मुनी कहा जाता था…  ..  ..  कलयुग में उन्हें Engineer कहा जाता है…!!!.सभाष बुड़ावन वाला @
पिताजी :- ये लो बेटा 1500 रुपए। बेटा :- ये किसलिए पापा? पिताजी :- बेटा, तुमने जब से वाट्सएप शुरू किया है, तब से रात को चौकीदार नहीं रखना पड़ा, रख ले ये तेरी मेहनत की कमाई है पगले।.सभाष बुड़ावन वाला@@@@@ .बॉस- कर्मचारी से, बताओदोनों में से बेवकूफ कौन है? कर्मचारी- पहले थोड़ा सोचा, फिर बोला- बॉस मैं यह अच्छी तरह से जानता हूं कि आप किसी बेवकूफ को जॉब नहीं देते हो।.-सभाष बुड़ावन वाला टीचर – छोटी मधुमक्खी तुम्हें क्या देती है? बच्चे – शहद। टीचर – पतली बकरी? बच्चे – दूध। टीचर – और मोटी भैंस? बच्चे – होमवर्क। फिर क्या था, दे…थप्पड़ पे थप्पड़। .सभाष बुड़ावन वाला पप्पू ट्रेन से अपने गांव जा रहा था टीसी आ गया और बोला टिकट दिखाओ। पप्पू: गरीब हैं साहब। चटनी बासी रोटी खाकर गुजारा करते हैं। टीसी – ठीक है टिकट दिखाओ? पप्पू- गरीब आदमी हैं साहब साग दाल रोटी खाते हैं। टीसी- गुस्सेमें- तो हम क्या गोबर खाते हैं पप्पू- आप बड़े आदमी हो साहब खाते होगे।
.सभाष बुड़ावन वाला.,

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